आज गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के कपाट पूरे विधि विधान से खुल जाएंगे। कपाट खुलने के साथ ही चारधाम यात्रा की औसत शुरुआत हो जाएगी। नौ मई को केदारनाथ जबकि 10 मई को बदरीनाथ धाम के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोले जाएंगे। वहीं गंगोत्री धाम के कपाट खुलने के साथ यात्री मंदिर में दर्शन कर सकते हैं। गंगोत्री धाम में निर्मलता से बह रही गंगा का स्वरूप देखने के लिए विदेशी साधक खासे उत्सुकता में रहते हैं। गंगोत्री की पौराणिक कथा ऐसा माना जाता है कि भगवान श्री राम के पूर्वज रघुकुल के चक्रवर्ती राजा भगीरथ ने यहां एक पवित्र शिलाखंड पर बैठकर भगवान शंकर की प्रचंड तपस्या की थी। राजा सगर के वंशज राज भगीरथ ने अपने पुरलों के उद्धार के लिए मां गंगा को धरती पर लाने के लिए बड़ी कठिन तपस्या की थी। राजा भगीरथ को ब्रह्मा जी से वरदान मिलने के बाद मां गंगा मृत्युलोक में आने को तैयार हो गए, जिसके बाद मां गंगा भगवान शिव की जटाओं से होते हुए राजा भगीरथ के पीछे-पीछे उनके पुरखों के उद्धार के लिए चल पड़ी.पिता हो गई है। । । । । । स्वर्ग से उतरकर गंगाजी ने पहली बार गंगोत्री में ही धरती को स्पर्श किया था। हालाँकि, गंगाजी का असली उद्गम स्थान गंगोत्री से 19 किमी दूर गोमुख में है, लेकिन अतीत से ही गंगोत्री में ही श्रद्धालु गंगाजी के प्रथम दर्शन करते हैं। गंगोत्री धाम ही वह स्थान है जहाँ राजा भगीरथ ने गंगा को धरती पर लाने के लिए कठोर तपस्या की।] यहां आज भी श्रद्धालु भगीरथ शिला को देखने दूर-दुल से पहुंचते हैं। इस पवित्र शिलाखंड के पास ही 18 वीं शताब्दी में गंगोत्री मंदिर का निर्माण किया गया था। किसी भी मान्यता ये है कि पंडों ने भी महाभारत के युद्ध में मारे गए अपने परिजनों की आत्म शांति के निमित समान स्थान पर आकर एक महान देव यज्ञ करवाया था। इस स्थान पर शंकराचार्य ने गंगा माता की एक मूर्ति स्थापित की थी। जहाँ यह मूर्ति की स्थापना हुई थी वहाँ गंगोत्री मंदिर का निर्माण गोरखिन्दरार सिंह थापा द्वारा 18 वीं शताब्दी में किया गया था। मंदिर में प्रबंध के लिए सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया। इसके पहले टकनौर के राजपूत ही गंगोत्री के पुजारी थे। अन्य मान्यता ये है कि पंडों ने भी महाभारत के युद्ध में मारा था अपने परिजनों की आत्म शांति के निमित समान स्थान पर आकर एक महान देव यज्ञ करवाया था। इस स्थान पर शंकराचार्य ने गंगा माता की एक मूर्ति स्थापित की थी। जहाँ यह मूर्ति की स्थापना हुई थी वहाँ गंगोत्री मंदिर का निर्माण गोरखिन्दरार सिंह थापा द्वारा 18 वीं शताब्दी में किया गया था। मंदिर में प्रबंध के लिए सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया। इसके पहले टकनौर के राजपूत ही गंगोत्री के पुजारी थे। अन्य मान्यता ये है कि पंडों ने भी महाभारत के युद्ध में मारे गए अपने परिजनों की आत्म शांति के निमित इसी स्थान पर आकर एक महान देव यज्ञ करवाया था। इस स्थान पर शंकराचार्य ने गंगा माता की एक मूर्ति स्थापित की थी। जहाँ यह मूर्ति की स्थापना हुई थी वहाँ गंगोत्री मंदिर का निर्माण गोरखिन्दरार सिंह थापा द्वारा 18 वीं शताब्दी में किया गया था। मंदिर में प्रबंध के लिए सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया। इसके पहले परिंडे की आत्म शांति के निमित समान स्थान पर आकर एक महान देव यज्ञ करवाया था। इस स्थान पर शंकराचार्य ने गंगा माता की एक मूर्ति स्थापित की थी। जहाँ यह मूर्ति की स्थापना हुई थी वहाँ गंगोत्री मंदिर का निर्माण गोरखिन्दरार सिंह थापा द्वारा 18 वीं शताब्दी में किया गया था। मंदिर में प्रबंध के लिए सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया। इसके पहले टकनौर के राजपूत ही गंगोत्री के पुजारी थे। अन्य मान्यता ये है कि पंडों ने भी महाभारत के युद्ध में मारे गए अपने परिजनों की आत्म शांति के निमित इसी स्थान पर आकर एक महान देव यज्ञ करवाया था। इस स्थान पर शंकराचार्य ने गंगा माता की एक मूर्ति स्थापित की थी। जहाँ यह मूर्ति की स्थापना हुई थी वहाँ गंगोत्री मंदिर का निर्माण गोरखिन्दरार सिंह थापा द्वारा 18 वीं शताब्दी में किया गया था। मंदिर में प्रबंध के लिए सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया। इसके पहले परिजनों की आत्म शांति के निमित समान स्थान पर आकर एक महान देव यज्ञ करवाया गया था। इस स्थान पर शंकराचार्य ने गंगा माता की एक मूर्ति स्थापित की थी। जहाँ यह मूर्ति की स्थापना हुई थी वहाँ गंगोत्री मंदिर का निर्माण गोरखिन्दरार सिंह थापा द्वारा 18 वीं शताब्दी में किया गया था। मंदिर में प्रबंध के लिए सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया। इसके पहले टकनौर के राजपूत ही गंगोत्री के पुजारी थे। अन्य मान्यता ये है कि पंडों ने भी महाभारत के युद्ध में मारे गए अपने परिजनों की आत्म शांति के निमित इसी स्थान पर आकर एक महान देव यज्ञ करवाया था। इस स्थान पर शंकराचार्य ने गंगा माता की एक मूर्ति स्थापित की थी। जहाँ यह मूर्ति की स्थापना हुई थी वहाँ गंगोत्री मंदिर का निर्माण गोरखिन्दरार सिंह थापा द्वारा 18 वीं शताब्दी में किया गया था। मंदिर में प्रबंध के लिए सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया। इसकी पहली शांति के निमित समान स्थान पर आकर एक महान देव यज्ञ करवाया था इस स्थान पर शंकराचार्य ने गंगा माता की एक मूर्ति स्थापित की थी। जहाँ यह मूर्ति की स्थापना हुई थी वहाँ गंगोत्री मंदिर का निर्माण गोरखिन्दरार सिंह थापा द्वारा 18 वीं शताब्दी में किया गया था। मंदिर में प्रबंध के लिए सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया। इसके पहले टकनौर के राजपूत ही गंगोत्री के पुजारी थे। अन्य मान्यता ये है कि पंडों ने भी महाभारत के युद्ध में मारे गए अपने परिजनों की आत्म शांति के निमित इसी स्थान पर आकर एक महान देव यज्ञ करवाया था। इस स्थान पर शंकराचार्य ने गंगा माता की एक मूर्ति स्थापित की थी। जहाँ यह मूर्ति की स्थापना हुई थी वहाँ गंगोत्री मंदिर का निर्माण गोरखिन्दरार सिंह थापा द्वारा 18 वीं शताब्दी में किया गया था। मंदिर में प्रबंध के लिए सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया। इसके पहले शांति के निमित समान स्थान पर आकर एक महान देव यज्ञ करवाया गया था। इस स्थान पर शंकराचार्य ने गंगा माता की एक मूर्ति स्थापित की थी। जहाँ यह मूर्ति की स्थापना हुई थी वहाँ गंगोत्री मंदिर का निर्माण गोरखिन्दरार सिंह थापा द्वारा 18 वीं शताब्दी में किया गया था। मंदिर में प्रबंध के लिए सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया। इसके पहले टकनौर के राजपूत ही गंगोत्री के पुजारी थे। अन्य मान्यता ये है कि पंडों ने भी महाभारत के युद्ध में मारे गए अपने परिजनों की आत्म शांति के निमित इसी स्थान पर आकर एक महान देव यज्ञ करवाया था। इस स्थान पर शंकराचार्य ने गंगा माता की एक मूर्ति स्थापित की थी। जहाँ यह मूर्ति की स्थापना हुई थी वहाँ गंगोत्री मंदिर का निर्माण गोरखिन्दरार सिंह थापा द्वारा 18 वीं शताब्दी में किया गया था। मंदिर में प्रबंध के लिए सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया। इसके पहले महान देव यज्ञ करवाया गया था इस स्थान पर शंकराचार्य ने गंगा माता की एक मूर्ति स्थापित की थी। जहाँ यह मूर्ति स्थापित है। गंगोत्री मंदिर का निर्माण गोरखिन्दरार सिंह थापा द्वारा 18 वीं शताब्दी में किया गया था। मंदिर में प्रबंध के लिए सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया। इसके पहले टकनौर के राजपूत ही गंगोत्री के पुजारी थे। अन्य मान्यता ये है कि पंडों ने भी महाभारत के युद्ध में मारे गए अपने परिजनों की आत्म शांति के निमित इसी स्थान पर आकर एक महान देव यज्ञ करवाया था। इस स्थान पर शंकराचार्य ने गंगा माता की एक मूर्ति स्थापित की थी। जहाँ यह मूर्ति की स्थापना हुई थी वहाँ गंगोत्री मंदिर का निर्माण गोरखिन्दरार सिंह थापा द्वारा 18 वीं शताब्दी में किया गया था। मंदिर में प्रबंध के लिए सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया। इसके पहले महान देव यज्ञ करवाया गया था इस स्थान पर शंकराचार्य ने गंगा माता की एक मूर्ति स्थापित की थी। जहाँ यह मूर्ति की स्थापना हुई थी वहाँ गंगोत्री मंदिर का निर्माण हुआ था गोरखिन्दर सिंह थापा द्वारा 18 वीं शताब्दी में किया गया था। मंदिर में प्रबंध के लिए सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया। इसके पहले टकनौर के राजपूत ही गंगोत्री के पुजारी थे। अन्य मान्यता ये है कि पंडों ने भी महाभारत के युद्ध में मारे गए अपने परिजनों की आत्म शांति के निमित इसी स्थान पर आकर एक महान देव यज्ञ करवाया था। इस स्थान पर शंकराचार्य ने गंगा माता की एक मूर्ति स्थापित की थी। जहाँ यह मूर्ति की स्थापना हुई थी वहाँ गंगोत्री मंदिर का निर्माण गोरखिन्दरार सिंह थापा द्वारा 18 वीं शताब्दी में किया गया था। मंदिर में प्रबंध के लिए सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया। इसकी पहली मूर्ति स्थापित की गई थी। जहाँ यह मूर्ति की स्थापना हुई थी वहाँ गंगोत्री मंदिर का निर्माण गोरखिन्दरार सिंह थापा द्वारा 18 वीं शताब्दी में किया गया था। मंदिर में प्रबंध के लिए सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को । को भी नियुक्त किया। इसके पहले टकनौर के राजपूत ही गंगोत्री के पुजारी थे। अन्य मान्यता ये है कि पंडों ने भी महाभारत के युद्ध में मारे गए अपने परिजनों की आत्म शांति के निमित इसी स्थान पर आकर एक महान देव यज्ञ करवाया था। इस स्थान पर शंकराचार्य ने गंगा माता की एक मूर्ति स्थापित की थी। जहाँ यह मूर्ति की स्थापना हुई थी वहाँ गंगोत्री मंदिर का निर्माण गोरखिन्दरार सिंह थापा द्वारा 18 वीं शताब्दी में किया गया था। मंदिर में प्रबंध के लिए सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया। इसकी पहली मूर्ति स्थापित की गई थी। जहाँ यह मूर्ति की स्थापना हुई थी वहाँ गंगोत्री मंदिर का निर्माण गोरखिन्दरार सिंह थापा द्वारा 18 वीं शताब्दी में किया गया था। मंदिर में प्रबंध के लिए सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया। इसके पहले टकनौर के राजपूत ही गंगोत्री के पुजारी थे। अन्य मान्यता ये है कि पंडों ने भी महाभारत के युद्ध में मारा था गया था अपने परिजनों की आत्महत्या कर ली थी शांति के निमित समान स्थान पर आकर एक महान देव यज्ञ करवाया गया था। इस स्थान पर शंकराचार्य ने गंगा माता की एक मूर्ति स्थापित की थी। जहाँ यह मूर्ति की स्थापना हुई थी वहाँ गंगोत्री मंदिर का निर्माण गोरखिन्दरार सिंह थापा द्वारा 18 वीं शताब्दी में किया गया था। मंदिर में प्रबंध के लिए सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया। पहले यह था। मंदिर में प्रबंध के लिए सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया। इसके पहले टकनौर के राजपूत ही गंगोत्री के पुजारी थे। अन्य मान्यता ये है कि पंडों ने भी महाभारत के युद्ध में मारे गए अपने परिजनों की आत्म शांति के निमित इसी स्थान पर आकर एक महान देव यज्ञ करवाया था। इस स्थान पर शंकराचार्य ने गंगा माता की एक मूर्ति स्थापित की थी। जहाँ यह मूर्ति की स्थापना हुई थी वहाँ गंगोत्री मंदिर का निर्माण गोरखिन्दरार सिंह थापा द्वारा 18 वीं शताब्दी में किया गया था में किया गया था किया गया था। मंदिर में भर्ती के लिए सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया। पहले यह था। मंदिर में प्रबंध के लिए सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया। इसके पहले टकनौर के राजपूत ही गंगोत्री के पुजारी थे। अन्य मान्यता ये है कि पंडों ने भी महाभारत के युद्ध में मारे गए अपने परिजनों की आत्म शांति के निमित इसी स्थान पर आकर एक महान देव यज्ञ करवाया था। इस स्थान पर शंकराचार्य ने गंगा माता की एक मूर्ति स्थापित की थी। जहाँ यह मूर्ति की स्थापना हुई थी वहाँ गंगोत्री मंदिर का निर्माण गोरखिन्दरार सिंह थापा द्वारा 18 वीं शताब्दी में किया गया था। मंदिर में प्रबंध के लिए सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया। इसके पहले कर दिया गया था। इस स्थान पर शंकराचार्य ने गंगा माता की एक मूर्ति स्थापित की थी। जहाँ यह मूर्ति की स्थापना हुई वहाँ गंगोत्री मंदिर का निर्माण गोरखिन्दर सिंह थापा द्वारा 18 वीं शताब्दी में किया गया था। था। मंदिर में प्रबंध के लिए सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया। इसके पहले कर दिया गया था। इस स्थान पर शंकराचार्य ने गंगा माता की एक मूर्ति स्थापित की थी। जहाँ यह मूर्ति की स्थापना हुई थी वहाँ गंगोत्री मंदिर का निर्माण गोरखिन्दरार सिंह थापा द्वारा 18 वीं शताब्दी में किया गया था। मंदिर में प्रबंध के लिए सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया। इसके पहले गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया गया था। इसके पहले गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया गया था। इसके पहले मंदिर का निर्माण गोरखिन्दरार सिंह थापा द्वारा 18 वीं शताब्दी में किया गया था। मंदिर में प्रबंध के लिए सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया। इसके पहले गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया गया था। इसके पहले गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया गया था। इसके पहले मंदिर का निर्माण गोरखिन्दरार सिंह थापा द्वारा 18 वीं शताब्दी में किया गया था। मंदिर में प्रबंध के लिए सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया। इसके पहले गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया गया था। इसके पहले गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया गया था। इसके पहलेगंगोत्री धाम की विशेषता

  • गंगोत्री मंदिर भारत के प्रमुख मंदिरों में एक.एल मां गंगा का उद्गम स्थल गंगोत्री चार धाम यात्रा का दूसरा पड़ाव है। पहली पड़ाव यमुनोत्री है।
  • गंगोत्री मंदिर भागीरथी नदी के तट पर स्थित है।
  • यह मंदिर 3100 मीटर (10,200 फीट) की ऊंचाई पर ग्रेटर हिमालय श्रेणी पर स्थित है।
  • गंगोत्री में गंगा का उद्गम स्रोत यहां से लगभग 24 किलोमीटर दूर गंगोत्री ग्लेशियर में 4,225 मीटर की ऊंचाई पर होने का अनुमान है।
  • गंगा का मंदिर, सूर्य, विष्णु और ब्रह्मकुंड आदि पवित्र स्थल यहीं पर हैं।
  • गंगोत्री से 19 किलोमीटर दूर, समुद्र तट से तिलारीबन 3,892 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गौमुख है। ये गंगोत्री ग्लेशियर का मुहाना और भागीरथी नदी का उद्गम स्थल है।
  • हर साल मई से अक्टूबर के महीने के बीच पतित पावनी गंगा माता के दर्शन करने के लिए लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन करने के लिए आते हैं।

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